ये जानकारियाँ हनफ़ी मज़हब के अनुसार हैं। दवा और इलाज जैसे ख़ास मामलों में अपने डॉक्टर से और अपने इलाक़े के मुफ़्ती या किसी भरोसेमंद आलिम से पूछें।
नीयत और सहरी
- रमज़ान के रोज़े की नीयत शाम से लेकर अगले दिन ज़हवा-ए-कुबरा (ज़ुहर से लगभग एक घंटा पहले) तक की जा सकती है। नीयत दिल से होती है; रोज़ा रखने के लिए सहरी को उठना भी नीयत है।
- क़ज़ा, कफ़्फ़ारा और (बिना तय दिन की) मन्नत के रोज़ों की नीयत रात में, ज़्यादा से ज़्यादा सहरी का वक़्त ख़त्म होने से पहले करना और यह तय करना ज़रूरी है कि कौन-सा रोज़ा है।
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जिनसे रोज़ा नहीं टूटता
- भूलकर खाना-पीना (याद आते ही फ़ौरन छोड़ दें और रोज़ा जारी रखें)
- अपने आप आ जाने वाली उल्टी
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जिनसे सिर्फ़ क़ज़ा वाजिब होती है
- वुज़ू करते वक़्त या ग़रारा करते वक़्त बिना इरादे के पानी गले में चला जाना
- जान-बूझकर मुँह भर उल्टी करना
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जिनसे क़ज़ा और कफ़्फ़ारा दोनों वाजिब होते हैं
- रमज़ान के रोज़े की रात में नीयत करके रोज़ा शुरू करने के बाद, बिना किसी उज़्र के जान-बूझकर खाना, पीना या हमबिस्तरी करना क़ज़ा और कफ़्फ़ारा दोनों को वाजिब करता है।
- कफ़्फ़ारा लगातार साठ रोज़े रखना है; जो इसकी ताक़त न रखे वह साठ मिस्कीनों को एक दिन सुबह-शाम पेट भर खाना खिलाए (या हर एक को एक फ़ितरे के बराबर दे)।
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जिन्हें रोज़ा न रखने की छूट है
- बीमार, जिसके रोज़ा रखने से बीमारी बढ़ जाए या ठीक होने में देर हो; ठीक होने पर क़ज़ा करे।
- मुसाफ़िर (लगभग 90 किलोमीटर या उससे ज़्यादा का सफ़र); लौटकर क़ज़ा करे। तकलीफ़ न हो तो रोज़ा रखना ज़्यादा फ़ज़ीलत वाला है।
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दुआएँ
सहरी की फ़ज़ीलत
تَسَحَّرُوا فَإِنَّ فِي السَّحُورِ بَرَكَةً
सहरी खाया करो, क्योंकि सहरी में बरकत है।
Hadith — al-Bukhari, Sawm 20 (no. 1923); Muslim, Siyam 45 (no. 1095), narrated by Anas ibn Malik (may Allah be pleased with him). Agreed upon — sahih.
इफ़्तार के समय
ذَهَبَ الظَّمَأُ وَابْتَلَّتِ الْعُرُوقُ وَثَبَتَ الْأَجْرُ إِنْ شَاءَ اللّٰهُ
प्यास बुझ गई, रगें तर हो गईं और अगर अल्लाह ने चाहा तो सवाब पक्का हो गया।
Hadith — Abu Dawud, Sawm 22 (no. 2357), narrated by Abdullah ibn Umar (may Allah be pleased with him); al-Daraqutni graded its chain hasan.
शब-ए-क़द्र में
اَللّٰهُمَّ اِنَّكَ عَفُوٌّ تُحِبُّ الْعَفْوَ فَاعْفُ عَنِّي
ऐ अल्लाह! बेशक तू माफ़ करने वाला है, माफ़ करना पसंद करता है, तो मुझे माफ़ कर दे।
Hadith — al-Tirmidhi, Da‘awat 84 (no. 3513); Ibn Majah, Du‘a 5 (no. 3850), narrated by Aisha (may Allah be pleased with her). Al-Tirmidhi graded it hasan sahih.
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